चाँद पर दाग हैं

Thursday, September 8, 2011 · Posted in , , ,

चाँद पर दाग हैं सबने कहा चाँद पर दाग हैं मैं नही माना इक तन्हा रात को मैं उससे पूछ बैठा की "ऐ चाँद क्या तुझ पर दाग हैं" वो बोला ये दाग नही माँ का टिका हैं जो मुझे दुनिया की नज़र से बचाता हैं ,,, इंसान ईस बात को समझना नही चाहता उसे तो कमी निकालने की लत पड़ गयी हैं ,,, मैं चुपचाप बैठा उसकी बाते सुन रहा था ,, वो बोला क्या हुआ तुम इतने चुप क्यूँ हो गए नज़रे झुकाकर मैं बोला "मैं भी इक इंसान हूँ"

एक रात हुई बरसात बहुत

एक रात हुई बरसात बहुत मैं रोया सारी रात बहुत हर गम था जमाने का लेकिन मैं तनहा था उस रात बहुत फिर आंख से ईक सावन बरसा जब सहर हुई तो ख्याल आया वो बादल कितना तनहा था जो बरसा सारी रात बहुत

रही न साँस में ख़ुशबू

रही न साँस में ख़ुशबू तो भाग फूट गए गया शबाब तो अपने पराए छूट गए कोई तो छोड़ गए कोई मुझको लूट गए महल गिरे सो गिरे, झोंपडे भी टूट गए

पत्थर की है दुनिया,

पत्थर की है दुनिया, जज्बात नहीं समझती, दिल में है क्या वो बात नहीं समझती, तनहा तो चांद भी है सितारों के बीच, मगर चांद का दर्द बेवफा रात नहीं समझती।